जीवन का सत्य क्या हैं?

जीवन का सत्य क्या हैं?

जीवन का सत्य क्या हैं?

छत्तीसगढ के आदिवासी बाहुल्य वनांचल क्षेत्र सरगुजा से मैं तिहत्तर वर्षीय डाॅ.जे.पी. श्रीवास्तव अपने जीवन की धारा को बदलने का प्रयास कर रहा हूँ। मै सोचता हूँ जीवन क्या है? जीवन का सत्य क्या हैं? इस पर चिंतन करने का हमें समय ही नहीं मिल पाता है। मेरे मन में विचार आता है कि क्या उच्च आर्थिक सामाजिक या राजनैतिक स्थिति को प्राप्त कर लेना ही, जीवन है। या जीवन का सत्य कुछ और ही है। आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक शिखर पर पहुँचे लोग, क्या अपने भविष्य के प्रति में पूर्ण रुप से निश्चिंत हैं। या ये लोग अपने भविष्य को पूर्ण सुरक्षित महसूंस करते हैं। सच तो यह है, कि ये लोेग अपने भविष्य के प्रति, और अधिक संसकित रहते हैं। ये लोग बाहर से तो प्रसन्न और सहज दिखते हैं। पर इनके भीतर बहुत से अशांत ज्वालामुखी धधकते रहते हैं। तब यह चिंतन आवश्यक हो जाता है कि क्या ईश्वर ने हमें, धनवान, प्रतिष्ठावान या उच्च पदों पर पदासीन होने के लिये जन्म दिया है। या ईश्वर की हमारे प्रति कोई और अपेक्षा है। क्या इस तथ्य पर चिंतन करना आवश्यक नही है। यदि आवश्यक है तो चलिये आज और अभी से इस ओर चिंतन का शुमारंभ करते है।

 

 

 

चैत्र नवरात्रि की मीमांसा

चैत्र नवरात्रि की मीमांसा

चैत्र नवरात्रि मात्र एक पर्व ही नहीं है, वरन् धर्म, संस्कृति, समाजिकता और विज्ञान का एक प्रखर संगम है। चैत्र नवरात्रि के परिप्रेक्ष्य में अनेक मिथक जनश्रुतियां और मत हैं। सर्वाधिक प्रचलित मत दावन महिषासुर से जुड़ा हुआ है।

महिषासुर कौन था ?

दानव महिषासुर ऋषि कश्यप का पोता था और दानवराज रंभ का पुत्र था। महिषासुर का आधा शरीर भैंस का और आधा शरीर दानव का था। महिषासुर ने ब्रम्हा जी की घौर तपस्या कर उनसे अमरता का वरदान प्राप्त किया था। महिषासुर ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अपना अधिपत्य कायम कर लिया था। उसके अत्याचार से सभी लोकों में हा-हाकार मच गया था।

दैत्य, राक्षस और दानव में क्या भेद है ?

महिषासुर एक दानव था, दानव अपना आकार और रुप अपनी इच्छानुसार बदल सकते है। बलि, दैत्यराज थे और ये दैत्यों की श्रेणी में आते थे। रावण, राक्षस था। राक्षस, दानव और दैत्य तीनों अलग-अलग है। इनमें दानव सबसे अत्याचारी माने जाते हैं।

नवरात्रि का शुभारंभ और आदिशक्ति

महिषासुर से अत्याचार से सभी देवता अत्यंत भयभीत तथा दुःखी हो गये थे। सभी देवता, भगवान ब्रम्हा विष्णु और महेश की शरण में गये और अपनी व्यथा बतायी। तब भगवान ब्रम्हा, विष्णु, महेश के क्रोध से एक ज्योति निकली, और उस ज्योति ने आदिशक्ति का रुप लिया, उस आदिशक्ति को ब्रम्हा, विष्णु, महेश सहित सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये। माँ आदिशक्ति ने नौ दिनों तक अलग-अलग रुपों में महिषासुर से घोर युद्ध किया। पहला दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रम्हचारिणी, तीसरे दिन चंद्रघंटा, चौथे दिन कुष्मांडा, पांचवे दिन स्कंदमाता, छठवें दिन कत्यायनी, सातवें दिन कालरात्रि, आठवें दिन महागौरी, नौवें दिन सिद्धदात्री का रुप लेकर घोर युद्ध करते हुवे, दसवें दिन दानव महिषासुर का वध कर दिया, इस तरह नवरात्रि पर्व का शुभारंभ हुआ।

नवरात्रि और किष्किधां

चैत्र नवरात्रि  के शुभारंभ की एक और कथा है कि किष्किंधा के समीप कृष्यमूल पर्वत पर चढ़ाई करते समय भगवान राम ने नौ दिनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किये माँ दुर्गा की उपासना की थी। उसी के फल के कारण भगवान राम ने रावण पर विजय पाई थी। अनेक लोगों का मत है कि तभी से नवरात्रि का पर्व प्रारंभ हुआ है।

नवरात्रि और पिठक व शुन्ती

नवरात्रि के परिप्रेक्ष्य में एक कथा और आती है कि देवताओं के गुरु वृहस्पति जी ने भगवान ब्रम्हा से नवरात्रि शुभारंभ के बारे में पूछा तो ब्रम्हाजी ने बताया कि पिठत नाम का एक ब्राम्हण था, जो भगवान का बहुत बड़ा भक्त था। उसने अपनी पुत्री शुन्ती को श्राप दिया था, श्राप के कारण शुन्ती को कुष्ठ रोग से पीड़ित पति मिला था, शुन्ती ने नौ दिन तक मॉ दुर्गा की बिना अन्न-जल ग्रहण किये घोर तपस्या की, तब माँ दुर्गा प्रकट हुई और शुन्ती से वरदान मांगने को कहा तो शुन्ती ने कहा मॉ मेरा पति कुष्ठ रोग से मुक्त हो जाये। माँ दुर्गा ने कहा, कि तुम नौ दिनों में से एक दिन का पुण्य दान कर दो, तो तुम्हारा पति कुष्ठ रोग से मुक्त हो जायेगा, शुन्ती ने नौ दिनों में से एक दिन का पुण्य दान कर दिया तो उसका पति कुष्ठ मुक्त हो गया। जब एक दिन के पुण्य का इतना महत्व है तो नौ दिनों के पुण्य का कितना महत्व होगा।

नवरात्रि, माँ शाकाम्बरी और जौ (जवारा)

दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में माँ शाकाम्बरी की कथा है, इस कथा के अनुसार सौ साल के घोर अकाल के बाद पृथ्वी में एक भी अन्न नहीं बचा। समस्त पृथ्वी बंजर हो गयी। मनुष्य अन्न के बिना मरने लगे, तब मां शाकाम्बरी ने अपनी काया से शाक (अन्न) को उत्पन्न किया, वह पहला शाक (अन्न) जौ था। इसीलिये नवरात्रि में जौ को अंकुरित कर जवारा बोने का प्रचलन है। मन्यता है कि ‘‘जौ’’ पृथ्वी में उगने वाला सबसे पहला अन्न है, जो मॉ शाकाम्बरी की काया से उत्पन्न हुआ है।

वरात्रि का वैज्ञानिक पक्ष

नवरात्रि के समय शीत ऋतु समाप्त होती है, वसंत और ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। ऋतुओं का संधिकाल, संक्रमण काल होता है, इस समय रोग और बीमारियां अत्यधिक प्रभावी होती है, रोगाणुओं का प्रभाव बढ़ जाता है। इस समय उपवास, व्रत तथा स्वच्छता, का प्रभाव मनुष्य को शारीरिक तथा मानसिक रुप से सम्बल बनाता है, जिससे मनुष्य में बैक्टीरिया तथा वायरस से लड़ने की क्षमता बढ़ती है और मनुष्य की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (एम्यूनिटी) में वृद्धि होती है। वर्ष में दो बार नवरात्रि आती है। नौ दिन के उपवास तथा मानसिक व्रत से मनुष्य के शरीर की ओव्हरहालिंग हो जाती है, और व्यक्ति नई उर्जा के साथ कार्य करता है। आज विज्ञान भी उपवास की महत्ता को स्वीकार कर रहा है। आज ऋषियों, मुनियों की तरह चिकित्सक और वैज्ञानिक भी उपवास रहने की सलाह देते हैं।

नवरात्रि का सामाजिक पक्ष

माँ के महत्व और नारी शक्ति का प्रतीत है नवरात्रि पर्व। जब महिषासुर से सभी देवता हार गये थे, तब सभी देवताओं को माँ का स्मरण हुआ। समस्त पुरुष समाज के थक जाने के बाद एक नारी के रुप में माँ आदिशक्ति ने अस्त्र-शस्त्र उठाये और महिषासुर का वध किया। नारी शक्ति का यही दर्शन, नवरात्रि पर्व में समाहित है।

नवरात्रि ही क्यों, नवदिवस क्यों नहीं,

इस महत्वपूर्ण पर्व का नाम नवरात्रि क्यों पड़ा नव दिवस क्यों नहीं पड़ा, इस पर भी चिंतन आवश्यक है। रात्रि का अपना महत्व है। दीपावली हो या होलिका दहन हो, या शिवरात्रि, सभी रात में ही मनायें जाते है, इसका कारण है कि ऋषि, मुनियों ने दिन से अधिक रात्रि को महत्व दिया है। रात्रि में कोलहल नहीं होता, शांति रहती है, एकाग्रता अधिक रहती है। माँ आदिशक्ति और महिषासुर के बीच रात दिन अनवरत रुप से नौ दिन तक युद्ध चला था, दिन की अपेक्षा रात्रि के समय, यह युद्ध और भयंकर हो जाता था। इसलिये यह पर्व नव दिवस के रुप में नहीं, नवरात्रि के रुप में मनाया जाता है।

 

 

आँसुओं का मूल्य

आँसुओं का मूल्य:- 

आँसुओं का मूल्य:- 

आज के युग में मनुष्य की कमाई की या उसकी उपलब्धियों का आंकलन उसके आर्थिक कद, या फिर उसकी ख्याति, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा से ही किया जाता है, पर क्या यह आंकलन सही है। बहुत से लोगों का यह भी सोचना है, और पहले मैं, भी यही सोचा करता था कि मनुष्य के जीवन की वास्तिविक कमाई का पता इस बात से चलता है, कि उस व्यक्ति की अर्थी के पीछे कितने लोग चल रहे हैं, पर अब उम्र के पड़ाव पार करने के बाद मेरी सोच बदल गयी है। अब मुझे यह लगने लगा है कि व्यक्ति की अर्थी के पीछे चलने वाले व्यक्तियों की संख्या ही व्यक्ति के जीवन की वास्तविक कमाई नहीं है, क्योेंकि दिवगंत व्यक्ति की अर्थी के पीछे चलने वाले बहुत से लोग सामाजिक बाध्यता के कारण तथा उस दिवगंत व्यक्ति की पद प्रतिष्ठा तथा ओहदा के प्रभाव के कारण भी अर्थी के पीछे चलते हैैं।

मेरा सोचना है कि मनुष्य के जीवन की वास्तविक कमाई यह है कि उस व्यक्ति की अर्थी निकलते समय कितने लोगों के, कितनी मात्रा में आँसू गिरे। इन आँसुओं की मात्रा ही उस व्यक्ति के जीवन की वास्तविक कमाई है, क्योंकि आँसुओं का मूल्य सहज नहीं होता। आँसुओं की एक-एक बूंद में भावनाओं अनेक महासागर समाये रहते हैं।